रविवार, 23 अगस्त 2020

तीज री बधाई

तीज री तीजणिंया ने छोटी मोटी बीनणियां ने माता बेंना भोजायां ने बेली दोस्ता री लुगाया ने बालद भाट कावड़िया ने छाणां चुगती डावङिया ने तंबाकू सूंघती डोकरिया ने हींडा हींडती छोकरीयां ने बस री सवारियां ने नयी नवेली बवारियां ने छोटी मोटी सगलां ने छाती रोंधती धणियों री धणियोंणियो ने तीज री घणी घणी बधाई ll

गणपति बाप्पा आरती

मंगलवार, 18 अगस्त 2020

.. कान की व्यथा..

👂🏻...कान की व्यथा...👂🏻 मैं हूँ कान... हम दो हैं... जुड़वां भाई... लेकिन हमारी किस्मत ही ऐसी है कि आज तक हमने एक दूसरे को देखा तक नहीं 😪... पता नहीं.. कौन से श्राप के कारण हमें विपरित दिशा में चिपका कर भेजा गया है 😠... दु:ख सिर्फ इतना ही नहीं है... हमें जिम्मेदारी सिर्फ सुनने की मिली है.. गालियाँ हों या तालियाँ.., अच्छा हो या बुरा.., सब हम ही सुनते हैं... धीरे धीरे हमें "खूंटी" समझा जाने लगा... चश्मे का बोझ डाला गया, फ्रेम की डण्डी को हम पर फँसाया गया... ये दर्द सहा हमने... क्यों भाई..??? चश्मे का मामला आंखो का है तो हमें बीच में घसीटने का मतलब क्या है...???!! हम बोलते नहीं तो क्या हुआ, सुनते तो हैं ना... हर जगह बोलने वाले ही क्यों आगे रहते है....??? बचपन में पढ़ाई में किसी का दिमाग काम न करे तो मास्टर जी हमें ही मरोड़ते हैं 😡... जवान हुए तो आदमी,औरतें सबने सुन्दर सुन्दर लौंग, बालियाँ, झुमके आदि बनवाकर हम पर ही लटकाये...!!! छेदन हमारा हुआ, और तारीफ चेहरे की ...! और तो और... श्रृंगार देखो... आँखों के लिए काजल... मुँह के लिए क्रीमें... होठों के लिए लिपस्टिक... हमने आज तक कुछ माँगा हो तो बताओ... कभी किसी कवि ने, शायर ने कान की कोई तारीफ की हो तो बताओ... इनकी नजर में आँखे, होंठ, गाल, ये ही सब कुछ है... हम तो जैसे किसी मृत्युभोज की बची खुची दो पूड़ियाँ हैं.., जिसे उठाकर चेहरे के साइड में चिपका दिया बस... और तो और, कई बार बालों के चक्कर में हम पर भी कट लगते हैं ... हमें डिटाॅल लगाकर पुचकार दिया जाता है... बातें बहुत सी हैं, किससे कहें...??? कहते है दर्द बाँटने से मन हल्का हो जाता है... आँख से कहूँ तो वे आँसू टपकाती हैं...नाक से कहूँ तो वो बहाता है... मुँह से कहूँ तो वो हाय हाय करके रोता है... और बताऊँ... पण्डित जी का जनेऊ, टेलर मास्टर की पेंसिल, मिस्त्री की बची हुई गुटखे की पुड़िया सब हम ही सम्भालते हैं... और आजकल ये नया-नया "मास्क" का झंझट भी हम ही झेल रहे हैं... कान नहीं जैसे पक्की खूँटियाँ हैं हम... और भी कुछ टाँगना, लटकाना हो तो ले आओ भाई... तैयार हैं हम दोनों भाई...!¡! 😜😊😅🤫😷 🙏🏻🙏🏻

सोमवार, 27 जुलाई 2020

कोरोना महामारी को लेकर एक सरकारी अधिकारी ने अपनी कलम से क्या खूब लिखा।

मैंने संवेदनाओ को मरते देखा है, मैंने अस्पताल में भावनाओ को मरते देखा है। माँ मर जाए तो बेटे के आंखों में आँसू नही है, क्योकि वो कोरोना पीड़ित है। ओर बेेटा मर जाए तो, माँ के आंखों में आंसू नही है, क्योंकि वह कोरोना पीड़ित है। माँ मर जाए तो बेटे के आंखों में आँसू नही है, क्योकि वो कोरोना पीड़ित है। ओर बेेटा मर जाए तो, माँ के आंखों में आंसू नही है, क्योंकि वह कोरोना पीड़ित है। क्या समय आ गया है ? मैंने आँखों से देखा है, मैंने अस्पताल में भावनाओ को मरते देखा है। वह तड़प तड़प कर मर गया , वह बिलख बिलख कर मर गया। वह तड़प तड़प कर मर गया , वह बिलख बिलख कर मर परिजनों से कोई संपर्क नही, वह रोते रोते मर गया। भर्ती होने आया था,वे तब परिजन आये थे साथ, मोबाइल नंबर गलत लिखाकर नाता तोड़ कर गये थे साथ। भर्ती होने आया था,वे तब परिजन आये थे साथ, मोबाइल नंबर गलत लिखाकर नाता तोड़ कर गये थे साथ। मैंने कोरोना से रिश्ते तार तार होते देखा है, मैंने अस्पताल में भावनाओ को मरते देखा है। कुछ लोग अस्पताल प्रसाशन पर आरोप लगते, कुछ लोग डॉक्टरों को शैतान बताते, कहने दो लोगो का क्या, बातेे तो बनाएंगे ही, अपनी गलती छुपाकर दुसरो को मूर्ख बनायेगे ही, कहने दो लोगो का क्या, बातेे तो बनाएंगे ही, अपनी गलती छुपाकर दुसरो को मूर्ख बनायेगे ही, पर हक़ीक़त कुछ और ही है, बताना बहुत जरूरी है। मैं ठहरा मन का कवि, यही मेरी मजबूरी है। मैं खाकी वर्दी वाला हूँ। मैंने मेरी आँखो से देखा है, मैंने अस्पताल में भावनाओ को मरते देखा है। मृतक की मृत्यु के बाद कुछ लोग अस्पताल आकर ऐतराज जताते है। डॉक्टरों कि कमी से मर गया वह उसका इलाज नही हुआ, दुनिया को बताने पर अंतिम संस्कार के लिए उस मुर्दे को छोड़कर पुलिस के भरोसे चले जाते है। हम कह कहकर विनंती उनसे थक जाते है, मैंने शमशान घाट में बिना परिजनों के मुर्दे को जलते देखा है। मैंने अस्पताल में भावनाओं को मरते देखा है । मैंने अस्पताल में भावनाओं को मरते देखा है ।

गुरुवार, 16 जुलाई 2020

मर्डर या एनकाउटर ?

            विकास दुबे जिसे विकास पंडित के नाम से भी जाना है वो हिस्ट्रीशीटर उत्तर प्रदेश कानपुर जिला में गैगस्टर से नेता बना था। पहला अपराधिक मामला १९९० के दशक से सुरुआत हुई और २०२० आते -आते उनके नाम ६० से अधिक आपराधिक मामले दर्जे हो गए। मिडिया के अनुसार अपने राजनेतिक सम्बन्ध के कारण दुबे को अधिकांश हत्याओ मे बरी कर दिया गया, बावजूद कई गवाहो की मौजुदगी है। दुबे को विकास पंडित के नाम से भी जाना जाता था , जिसका नाम १९९९ की एक फिल्म अर्जुन पंडित के  शिर्षक चरित्र पर पड़ा। 
              वह चर्चा जब आया तब दुबे और उनके लोगो को गिरफ्तार करने के प्रयास के दौरान एक पुलिस अधिक्षक (DSP) सहित आठ पुलिसकर्मी मारे गए और सात पुलिसकर्मी घायल हो गए थे। शव परीक्षण रिपोर्ट मे पता चला की DSP की बेहरमी से हत्या की गई थी। कानपूर के IGP ने कहा कि कम कम ६० लोगो ने पुलिस पर घात लगाकर हमला किया। कॉल रिकार्ड से पता चला कि दुर्ब कई पुलिस वालो के संपर्क में था, जिन्होंने उसे जानकारी की। इसके बाद प्रशासन ने उसके घर को उसी के बुलडोजर से ढहा दिया, तब दुबे और उनके साथियो को ९ जुलाई २०२० को मध्यप्रदेश के उज्जैन महाकाल मंदिर मे पकड़ा गया।
          जब से १५ सवाल जहा UP पुलिस को 

रविवार, 29 मार्च 2020

महान लेखक टालस्टाय की एक कहानी है - "शर्त "


महान लेखक टालस्टाय की एक कहानी है - "शर्त " इस कहानी में दो मित्रो में आपस मे शर्त लगती है कि, यदि उसने 1 माह एकांत में बिना किसी से मिले,बातचीत किये एक कमरे में बिता देता है, तो उसे 10 लाख नकद वो देगा । इस बीच, यदि वो शर्त पूरी नहीं करता, तो वो हार जाएगा । पहला मित्र ये शर्त स्वीकार कर लेता है । उसे दूर एक खाली मकान में बंद करके रख दिया जाता है । बस दो जून का भोजन और कुछ किताबें उसे दी गई । उसने जब वहां अकेले रहना शुरू किया तो 1 दिन 2 दिन किताबो से मन बहल गया फिर वो खीझने लगा । उसे बताया गया था कि थोड़ा भी बर्दाश्त से बाहर हो तो वो घण्टी बजा के संकेत दे सकता है और उसे वहां से निकाल लिया जाएगा । जैसे जैसे दिन बीतने लगे उसे एक एक घण्टे युगों से लगने लगे । वो चीखता, चिल्लाता लेकिन शर्त का खयाल कर बाहर किसी को नही बुलाता । वोअपने बाल नोचता, रोता, गालियां देता तड़फ जाता,मतलब अकेलेपन की पीड़ा उसे भयानक लगने लगी पर वो शर्त की याद कर अपने को रोक लेता । कुछ दिन और बीते तो धीरे धीरे उसके भीतर एक अजीब शांति घटित होने लगी।अब उसे किसी की आवश्यकता का अनुभव नही होने लगा। वो बस मौन बैठा रहता। एकदम शांत उसका चीखना चिल्लाना बंद हो गया। इधर, उसके दोस्त को चिंता होने लगी कि एक माह के दिन पर दिन बीत रहे हैं पर उसका दोस्त है कि बाहर ही नही आ रहा है । माह के अब अंतिम 2 दिन शेष थे,इधर उस दोस्त का व्यापार चौपट हो गया वो दिवालिया हो गया।उसे अब चिंता होने लगी कि यदि उसके मित्र ने शर्त जीत ली तो इतने पैसे वो उसे कहाँ से देगा । वो उसे गोली मारने की योजना बनाता है और उसे मारने के लिये जाता है । जब वो वहां पहुँचता है तो उसके आश्चर्य का ठिकाना नही रहता । वो दोस्त शर्त के एक माह के ठीक एक दिन पहले वहां से चला जाता है और एक खत अपने दोस्त के नाम छोड़ जाता है । खत में लिखा होता है- प्यारे दोस्त इन एक महीनों में मैंने वो चीज पा ली है जिसका कोई मोल नही चुका सकता । मैंने अकेले मे रहकर असीम शांति का सुख पा लिया है और मैं ये भी जान चुका हूं कि जितनी जरूरतें हमारी कम होती जाती हैं उतना हमें असीम आनंद और शांति मिलती है मैंने इन दिनों परमात्मा के असीम प्यार को जान लिया है । इसीलिए मैं अपनी ओर से यह शर्त तोड़ रहा हूँ अब मुझे तुम्हारे शर्त के पैसे की कोई जरूरत नही। इस उद्धरण से समझें कि लॉकडाउन के इस परीक्षा की घड़ी में खुद को झुंझलाहट,चिंता और भय में न डालें,उस परमात्मा की निकटता को महसूस करें और जीवन को नए दृष्टिकोण से देखने का प्रयत्न कीजिये, इसमे भी कोई अच्छाई होगी यह मानकर सब कुछ भगवान को समर्पण कर दें। विश्वास मानिए अच्छा ही होगा । लॉक डाउन का पालन करे।स्वयं सुरक्षित रहें,परिवार,समाज और राष्ट्र को सुरक्षित रखें। लॉक डाउन के बाद जी तोड़ मेहनत करना है,स्वयं,परिवार और राष्ट्र के लिए...देश की गिरती अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए👍🏻👍🏻👍🏻सभी को🙏🏻🙏🏻🙏🏻 लेखक - नयना पटेल

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

मेरे संस्कृत, हिन्दी के गुरुजी के कलम से लिखी.....

शायद उस दिन...!

मेरे परदादा,
संस्कृत और हिंदी जानते थे।
माथे पे तिलक,
और सर पर पगड़ी बाँधते थे।।

फिर मेरे दादा जी का,
दौर आया।
उन्होंने पगड़ी उतारी,
पर जनेऊ बचाया।।

मेरे दादा जी,
अंग्रेजी बिलकुल नहीं जानते थे।
जानना तो दूर,
अंग्रेजी के नाम से कन्नी काटते थे।।

मेरे पिताजी को अंग्रेजी,
थोड़ी थोड़ी समझ में आई।
कुछ खुद समझे,
कुछ अर्थ चक्र ने समझाई।।

पर वो अंग्रेजी का प्रयोग,
मज़बूरी में करते थे।
यानि सभी सरकारी फार्म,
हिन्दी में ही भरते थे।।

जनेऊ उनका भी,
अक्षुण्य था।
पर संस्कृत का प्रयोग,
नगण्य था।।

वही दौर था,
जब संस्कृत के साथ,
संस्कृति खो रही थी।
इसीलिए संस्कृत,
मृत भाषा घोषित हो रही थी।।

धीरे धीरे समय बदला,
और नया दौर आया।
मैंने अंग्रेजी को पढ़ा ही नहीं,
अच्छे से चबाया।।

मैंने खुद को,
हिन्दी से अंग्रेजी में लिफ्ट किया।
साथ ही जनेऊ को,
पूजा घर में शिफ्ट किया।।

मैं बेवजह ही दो चार वाक्य,
अंग्रेजी में झाड़ जाता हूँ।
शायद इसीलिए समाज में,
पढ़ा लिखा कहलाता हूँ।।

और तो और,
मैंने बदल लिए कई रिश्ते नाते हैं।
मामा, चाचा, फूफा, अब
अंकल नाम से जाने जाते हैं।।

मैं टोन बदल कर वेद को वेदा,
और राम को रामा कहता हूँ।
और अपनी इस तथा कथित,
सफलता पर गर्वित रहता हूँ।।

मेरे बच्चे,
और भी आगे जा रहे हैं।
मैंने संस्कार चबाया था,
वो अंग्रेजी में पचा रहे हैं।।

यानि उन्हें दादी का मतलब,
ग्रैनी बताया जाता है।
रामा वाज़ ए हिन्दू गॉड,
गर्व से सिखाया जाता है।।

जब श्रीमती जी उन्हें,
पानी मतलब वाटर बताती हैं।
और अपनी इस प्रगति पर,
मंद मंद मुस्काती हैं।।

जाने क्यों मेरे पूजा घर की,
जीर्ण जनेऊ चिल्लाती है।
और मंद मंद,
कुछ मन्त्र यूँ ही बुदबुदाती है।।

कहती है - ये विकास,
भारत को कहाँ ले जा रहा है।
संस्कार तो गल गए,
अब भाषा को भी पचा रहा है।।

*संस्कृत की तरह हिन्दी भी*,
*एक दिन मृत घोषित हो जाएगी*।
*शायद उस दिन भारत भूमि*,
*पूर्ण विकसित हो जाएगी*।।
🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼

रविवार, 20 मई 2018

Story from My Brother

🏘️

एक घर मे तीन भाई और एक बहन थी...बड़ा और छोटा पढ़ने मे बहुत तेज थे। उनके मा बाप उन चारो से बेहद प्यार करते थे मगर मझले बेटे से थोड़ा परेशान से थे।

बड़ा बेटा पढ़ लिखकर डाक्टर बन गया।
छोटा भी पढ लिखकर इंजीनियर बन गया। मगर मझला बिलकुल अवारा और गंवार बनके ही रह गया। सबकी शादी हो गई । बहन और मझले को छोड़ दोनों भाईयो ने Love मैरीज की थी।

बहन की शादी भी अच्छे घराने मे हुई थी।
आखीर भाई सब डाक्टर इंजीनियर जो थे।

अब मझले को कोई लड़की नहीं मिल रही थी। बाप भी परेशान मां भी।
बहन जब भी मायके आती सबसे पहले छोटे भाई और बड़े भैया से मिलती। मगर मझले से कम ही मिलती थी। क्योंकि वह न तो कुछ दे सकता था और न ही वह जल्दी घर पे मिलता था।

वैसे वह दिहाडी मजदूरी करता था। पढ़ नहीं सका तो...नौकरी कौन देता। मझले की शादी कीये बिना बाप गुजर गये ।

माँ ने सोचा कहीं अब बँटवारे की बात न निकले इसलिए अपने ही गाँव से एक सीधी साधी लड़की से मझले की शादी करवा दी।
शादी होते ही न जाने क्या हुआ की मझला बड़े लगन से काम करने लगा ।
दोस्तों ने कहा... ए चन्दू आज अड्डे पे आना।

चंदू - आज नहीं फिर कभी
दोस्त - अरे तू शादी के बाद तो जैसे बिबी का गुलाम ही हो गया?
चंदू - अरे ऐसी बात नहीं । कल मैं अकेला एक पेट था तो अपने रोटी के हिस्से कमा लेता था। अब दो पेट है आज
कल और होगा।

घरवाले नालायक कहते थे कहते हैं मेरे लिए चलता है।
मगर मेरी पत्नी मुझे कभी नालायक कहे तो मेरी मर्दानगी पर एक भद्दा गाली है। क्योंकि एक पत्नी के लिए उसका पति उसका घमंड इज्जत और उम्मीद होता है। उसके घरवालो ने भी तो मुझपर भरोसा करके ही तो अपनी बेटी दी होगी...फिर उनका भरोसा कैसे तोड़ सकता हूँ । कालेज मे नौकरी की डिग्री मिलती है और ऐसे संस्कार मा बाप से मिलते हैं ।

इधर घरपे बड़ा और छोटा भाई और उनकी पत्नीया मिलकर आपस मे फैसला करते हैं की...जायदाद का बंटवारा हो जाये क्योंकि हम दोनों लाखों कमाते है मगर मझला ना के बराबर कमाता है। ऐसा नहीं होगा।

मां के लाख मना करने पर भी...बंटवारा की तारीख तय होती है। बहन भी आ जाती है मगर चंदू है की काम पे निकलने के बाहर आता है। उसके दोनों भाई उसको पकड़कर भीतर लाकर बोलते हैं की आज तो रूक जा? बंटवारा कर ही लेते हैं । वकील कहता है ऐसा नहीं होता। साईन करना पड़ता है।

चंदू - तुम लोग बंटवारा करो मेरे हिस्से मे जो देना है दे देना। मैं शाम को आकर अपना बड़ा सा अगूंठा चिपका दूंगा पेपर पर।
बहन- अरे बेवकूफ ...तू गंवार का गंवार ही रहेगा। तेरी किस्मत अच्छी है की तू इतनी अच्छे भाई और भैया मिलें
मां- अरे चंदू आज रूक जा।

बंटवारे में कुल दस विघा जमीन मे दोनों भाई 5- 5 रख लेते हैं ।
और चंदू को पुस्तैनी घर छोड़ देते है
तभी चंदू जोर से चिल्लाता है।

अरे???? फिर हमारी छुटकी का हिस्सा कौन सा है?
दोनों भाई हंसकर बोलते हैं
अरे मूरख...बंटवारा भाईयो मे होता है और बहनों के हिस्से मे सिर्फ उसका मायका ही है।

चंदू - ओह... शायद पढ़ा लिखा न होना भी मूर्खता ही है।
ठीक है आप दोनों ऐसा करो।
मेरे हिस्से की वसीएत मेरी बहन छुटकी के नाम कर दो।
दोनों भाई चकीत होकर बोलते हैं ।
और तू?

चंदू मां की और देखके मुस्कुराके बोलता है
मेरे हिस्से में माँ है न......
फिर अपनी बिबी की ओर देखकर बोलता है..मुस्कुराके...क्यों चंदूनी जी...क्या मैंने गलत कहा?

चंदूनी अपनी सास से लिपटकर कहती है। इससे बड़ी वसीएत क्या होगी मेरे लिए की मुझे मां जैसी सासु मिली और बाप जैसा ख्याल रखना वाला पति।
बस येही शब्द थे जो बँटवारे को सन्नाटा मे बदल दिया ।
बहन दौड़कर अपने गंवार भैया से गले लगकर रोते हुए कहती है की..मांफ कर दो भैया मुझे क्योंकि मैं समझ न सकी आपको।

चंदू - इस घर मे तेरा भी उतना ही अधिकार है जीतना हम सभी का।
बहुओं को जलाने की हिम्मत कीसी मे नहीं मगर फिर भी जलाई जाती है क्योंकि शादी के बाद हर भाई हर बाप उसे पराया समझने लगते हैं । मगर मेरे लिए तुम सब बहुत अजीज हो चाहे पास रहो या दुर।

माँ का चुनाव इसलिए कीया ताकी तुम सब हमेशा मुझे याद आओ। क्योंकि ये वही कोख है जंहा हमने साथ साथ 9 - 9 महीने गुजारे। मां के साथ तुम्हारी यादों को भी मैं रख रहा हूँ।

दोनों भाई दौड़कर मझले से गले मिलकर रोते रोते कहते हैं
आज तो तू सचमुच का बाबा लग  रहा है। सबकी पलको पे पानी ही पानी। सब एक साथ फिर से रहने लगते है।


I love my family's

बुधवार, 16 मई 2018

रविवार, 15 अप्रैल 2018

Story from My Sister

*रिश्ते"


Prince? ?????
पिताजी जोर से चिल्लाते हैं ।
प्रिंस दौड़कर आता है पूछता है...
क्या बात है पिताजी?
पिताजी- तूझे पता नहीं है आज तेरी बहन रश्मि आ रही है?  वह इस बार हम सभी के साथ अपना जन्मदिन मनायेगी..अब जल्दी से जा और अपनी बहन को लेके आ, हाँ और सुन...तू अपनी नई गाड़ी लेके जा जो तूने कल खरीदी थी..उसे अच्छा लगेगा,
प्रिंस - लेकिन मेरी गाड़ी तो मेरा दोस्त ले गया है सुबह ही...और आपकी गाड़ी भी ड्राइवर ये कहके ले गया की गाड़ी की ब्रेक चेक करवानी है।
पिताजी - ठीक है तो तू स्टेशन तो जा कीसी की गाड़ी या किराया करके? उसे बहुत खुशी मिलेगी ।
प्रिंस - अरे वह बच्ची है क्या जो आ नहीं सकेगी? आ जायेगी आप चिंता क्यों करते हो कीसी टैक्सी या आटो लेकर,
पिताजी - तूझे शर्म नहीं आती ऐसा बोलते हुए?  घर मे गांडीया होते हुए भी घर की बेटी कीसी टैक्सी या आटो से आयेगी?
प्रिंस - ठीक है आप जाओ मुझे बहुत काम है मैं जा नहीं सकता ।
पिताजी - तूझे अपनी बहन की थोड़ी भी फिकर नहीं? शादी हो गई तो क्या बहन पराया हो गई क्या उसे हम सबका प्यार पाने का हक नहीं? तेरा जितना अधिकार है इस घर में उतना ही तेरी बहन का भी है। कोई भी बेटी या बहन मायके छोड़ने के बाद वह पराया नहीं होती।
प्रिंस - मगर मेरे लिए वह पराया हो चुकी है और इस घर पे सिर्फ मेरा अधिकार है।
तडाक ...अचानक पिताजी का उठ जाता है प्रिंस पर और तभी माँ भी आ जाती है ।
मम्मी - आप कुछ शरम तो किजीऐ ऐसे जवान बेटे पर हाँथ बिलकुल नहीं उठाते।
पिताजी - तुमने सुना नहीं इसने क्या कहा, ?अपनी बहन को पराया कहता है ये वही बहन है जो इससे एक पल भी जुदा नहीं होती थी हर पल इसका ख्याल रखती थी। पाकेट मनी से भी बचाकर इसके लिए कुछ न कुछ खरीद देती थी। बिदाई के वक्त भी हमसे ज्यादा अपने भाई से गले लगकर रोई थी।
और ये आज उसी बहन को पराया कहता है।
प्रिंस -(मुस्कुराके)  बुआ का भी तो आज ही जन्मदिन है पापा...वह कई बार इस घर मे आई है मगर हर बार आटो से आई है..आपने कभी भी अपनी गाड़ी लेकर उन्हें लेने नहीं गये...माना वह आज वह तंगी मे है मगर कल वह भी बहुत अमीर थी । आपको मुझको इस घर को उन्होंने दिल खोलकर सहायता और सहयोग किया है। बुआ भी इसी घर से बिदा हुई थी फिर रश्मि दी और बुआ मे फर्क कैसा। रश्मि मेरी बहन है तो बुआ भी तो आपकी बहन है।
पापा... आप मेरे मार्गदर्शक हो आप मेरे हिरो हो मगर बस इसी बात से मैं हरपल अकेले में रोता हूँ। की तभी बाहर गाड़ी रूकने की आवाज आती है....तब तक पापा की प्रिंस की बातों से पश्चात की आग मे जलकर रोने लगे और इधर प्रिंस भी की रश्मि दौड़कर आके पापा मम्मी से गले मिलती है..लेकिन उनकी हालत देखकर पूछती है की क्या हुआ पापा?
पापा - तेरा भाई आज मेरे भी पापा बन गये हैं ।
रश्मि - ए पागल...नई गाड़ी न? बहुत ही अच्छी है मैंने ड्राइवर को पिछे बिठाकर खुद चलाके आई हूँ और कलर भी मेरी पशंद का है।
प्रिंस - happy birthday to you दी...वह गाड़ी आपकी है और हमारे तरफ से आपको birthday gift..
बहन सुनते ही खुशी से उछल पड़ती है की तभी बुआ भी अंदर आती है ।
बुआ - क्या भैया आप भी न, ??? न फोन न कोई खबर अचानक भेज दी गाड़ी आपने, भागकर आई हूँ खुशी से। ऐसा लगा पापा आज भी जिंदा हैं ..
इधर पिताजी अपनी पलकों मे आंशू लिये प्रिंस की ओर देखते हैं और प्रिंस पापा को चुप रहने की इशारा करता है।
इधर बुआ कहती जाती है की मैं कितनी भाग्यशाली हूँ को मुझे बाप जैसा भैया मिला,
ईश्वर करे मुझे हर जन्म मे आप ही भैया मिले...पापा
मम्मी को पता चल गया था की...ये सब प्रिंस की करतूत है मगर आज फिर एक बार रिश्तों को मजबूती से जुड़ते देखकर वह अंदर से खुशी से टूटकर रोने लगे। उन्हें अब पूरा यकीन था की...मेरे जाने के बाद भी मेरा प्रिंस रिश्तों को सदा हिफाजत से लखेगा
बेटी और बहन एक दो बेहद अनमोल शब्द हैं
जिनकी उम्र बहुत कम होती है । क्योंकि शादी के बाद एक बेटी और बहन किसी की पत्नी तो किसी की भाभी और किसी की बहू बनकर रह जाती है।
शायद लड़कियाँ इसी लिए मायके आती होंगी की...
उन्हें फिर से बेटी और बहन शब्द सुनने को बहुत मन करता होगा ।

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

चुटकले

नयी डॉक्टर ने अपनी लाइफ का पहला ऑपरेशन किया !
ऑपरेशन की थोडी देर बाद ही मरीज मर गया !
मरीज के मरने के बाद डॉक्टर ने दीवार पर टांगी भगवान की तस्वीर की और
हाथ जोड़कर सर झुकाते हुए कहा : हे प्रभु मेरी और से यह पहली भेंट स्वीकार कीजिये !



एक चोर अमीर आदमी के घर में चोरी करने गया !
तिजोरी पर लिखा था तिजोरी को तोड़ने की जरूरत नहीं है , 452 नंबर प्रेस करके सामने वाला लाल बटन दबाओ!
जैसे ही बटन दबा अलार्म बजा और पुलिस आ गयी !
जाते जाते चोर सेठ से बोला : आज मेरा इंसानियत से विश्वास उठ गया है !

रिक्शावाला

बी.ए. की परीक्षा पास कर रवि घर में बरसों से बेरोजगार बैठे रहकर जिंदगी गुजारना मुनासिब नहीं समझा। अपने पिता के गुजर जाने के बाद घर की देखरेख की जिम्मेवारी स्वतः उस पर आ गयी थी। घर में एक छोटा भाई था जो नवमी क्लास में एक सरकारी स्कूल में पढ़ रहा था। एक माँ थी जो थेड़ी बहुत सिलाई-कढ़ाई का काम घर पर रहकर ही कर लिया करती थी। रवि भी कुछ घरों में टयूशन पकड़ रखा था जिससे काम भर रूपये-पैसे का जुगाड़ हो जा रहा था। परंतु इन सब से दिन-ब-दिन बढ़ रही मंहगाई से निजात पाना संभव नहीं दिख रहा था।
    रवि के मन में एक विचार आया कि वह क्यों नहीं बगल के शहर में जाकर जहाँ कि उसके पहचानने वाले नहीं हो टयूशन के साथ-साथ खाली समय में रिक्शा पर यात्रियों को ढोया जाय। टयूशन तो अहले सुबह और फिर शाम ढ़लने पर ही चला करता है। थोड़ी बहुत मेहनत करने से अगर कुछ रूपये घर आ जाते है तो इसमें बुराई क्या है ? फिर घर के खर्च भी तो बढ़ रहे हैं।
    फिर क्या था रवि अपनी योजनानुसार भगवान का नाम लेकर सुबह नौ बजे से लेकर दोपहर के दो बजे तक अपने किराये के रिक्शे से यात्रियों को ढ़ोना शुरू कर दिया। हर रोज उसे इतने समय में आसानी से पांच-छः पैसेन्जर मिल ही जाते थे जिससे वह बिना ज्यादा थके 100 रूपये तक की कमाई कर लिया करता था। रवि मानसिक रूप से जितना सशक्त था उतना ही शरीरिक रूप से सुगठित। उसे शारीरिक और मानसिक कार्यों के साथ-साथ करने में ज्यादा असहज महसूस नहीं हो रहा था। वह उच्च मनोबल और दृढ़ इच्छाशक्ति वाला एक नेकदिल इंसान था। वह जीवन की सच्चाई को भलीभांति जानता था।
    इस तरह महीनों बीत गए, सबकुछ मोटामोटी ठीक-ठाक चल रहा था। एक दिन वह चौराहे के बगल में अपनी रिक्शा के साथ किसी यात्री के आने का इंतजार कर रहा था। तभी दो आधुनिक युवतियां जल्दीबाजी करती हुई उसके रिक्शे पर बैठ गई। इससे पहले कि रवि पूछता कि उन्हें कहाँ जाना है, उनलोगों ने ही कहना शुरू कर दिया-जल्दी करो, सूर्या नर्सिंग होम चलना है। क्विक, एकदम जल्दी।
    सूर्या नर्सिंग होम उस चौराहे से चार किलोमीटर की दूरी पर था। रवि उन दोनों को अपने रिक्शे पर बिठा नर्सिंग होम की तरफ धीरे-धीरे अभी चलना ही शुरू किया था कि उसके रिक्शे की चैन उतर गई। वह रिक्शे पर से नीचे उतरा चैन को ठीक कर गंतव्य दिशा की ओर उन्हें लेकर चल पड़ा। अभी आधा किमी चला ही था कि पुनः उसके रिक्शे की चैन नीचे उतर गई। दोनों बैठी युवतियों में से एक ने गुस्से में आकर रवि से कहा-रिक्शा ठीक नही ंतो पैसेंजरों को धोखा नहीं दिया करते। तुम्हें पता है हम कितनी जल्दबाजी में हैं। किसी के जीवन और मौत का सवाल है। कुछ समय बाद अगर हम दोनों वहाँ नहीं पहुंचे तो किसी की जान तक जा सकती है। मेरी माँ नर्सिंग होम में भर्ती है। उसे खून की जरूरत है, वह भी 'एबीप्लस', जल्दी मिलता भी नहीं है। अगर वह आधे घंटे के अंदर उसे नहीं मिला तो मैं अपनी माँ को खो दूंगी। अपनी गाड़ी थी वह भी धोखा दे गयी। आज बाजार में भी बंदी का असर है। वरना तुम जैसे रिकशे वालों को तो मैं पूछती तक नहीं-एक ही सांस में रिक्शे पर बैठी एक युवती कह गई।
    इसी बीच दूसरी युवती जो उस युवती की सहेली थी ने कहना शुरू कर दिया-लगता है आज अपशकुन होकर रहेगा। बंद का होना, गाड़ी का खराब होना, फिर अंतिम सहारा यह रिक्शा वह भी बार-बार उसकी चैन का उतरना। अब की बार रिक्शे की चैन मनाओ की नहीं उतरे वरना तेरी तो ऐसी की तैसी मैं कर दूंगी-पहली युवती ने कहा।
    रवि को लगने लगा कि आखिर किसका मुँह देखकर मैं उठा था जो लोगों की खरीखोटी सुननी पड़ रही है। इससे पहले तो रिक्शे की चैन उतरने की बीमारी नहीं थी। आखिर रिक्शा भी तो छोटी-मोटी मशीन ही है। इस पर तो हमारा उतना भी जोर नहीं। हे भगवान, यह कैसा धर्मसंकट, क्यों मेरी गरीबी और मजबूरी का इम्तिहान ले रहा है। यह सब सोच वह मन ही मन घबरा रहा था। वह अपने चलते रिक्शे को अचानक रोका। विपरीत दिशा से आ रहे खली रिक्शे के चालक को हाथ देना शुरू कर दिया। युवतियों से नहीं रहा गया, एक युवती आपा खोकर बोल बैठी-अब क्या हुआ ? चैन तो ठीक है। फिर क्यों रोकी अपनी रिक्शा को ? बहुत हो गया, नॉनसेंस, इडियट, बिगडैल कहीं के।
    रवि उनकी बातों को अनसुनी करते हुए एक दूसरे रिक्शे को रोक उसपर उन दोनों को सवार कराया और थोड़ी देर तक उनके रिक्शे को नजरों से ओझल होने देने का इंतजार करने लगा। ओझल होते ही वह मन में ढ़ेर सारी बातों को अपने अपने मन में संजोए वह उसी नर्सिंग होम की तरफ जाने वाली सड़क की ओर अकेले ही खाली रिक्शे को ले आगे बढ़ना शुरू कर दिया। उसके खाली रिक्शे को देख बहुत लोग हाथ देते पर वह था कि उनके इशारे को नजरअंदाज कर अपनी ही धुन में रिक्शे के पैंडल को और भी गतिमान करता जाता। मन ही मन मनाता कि उसके रिक्शे की चैन न फिर उतर जाय। मॉजिला टॉवर के ठीक बगल से दायीं ओर जाने वाली सड़क में सूर्या नर्सिंग होम था। उस ओर जाने वाली सड़क की ओर रवि अभी अपने रिक्शे को मोड़ा ही था कि उस रिक्शेवाले से उसकी भेंट हो गयी जो अभी-अभी उन दोनों युवतियों को नर्सिंग होम छोड़कर लौट रहा था। रवि उस रिक्शे वाले को रोक उनके बारे में कुछ जानना चाहा पर उसने साफ-साफ कह उससे कह दिया-उन्हें उतार अपनी सवारी के पैसे लिए और मैं चलता बना। पर तुम्हें उनकी इतनी खास चिंता क्यों ? उसकी बातों पर रवि उससे झूठ बोल गया कि उसके रिक्शे पर उनलोंगो ने कुछ अपना सामान छोड़ दिया था। इतना कुछ होने के बाद रवि जल्दी-जल्दी नर्सिंग होम पहुंचा। अपने रिक्शे को एक किनारे लगा उस नर्सिंग होम के 'इनक्वायरी काउंटर' पर जा पहुंचा। वहाँ पता करने पर उसे यह जानकारी मिली कि अभी-अभी जो दो युवतियां आयीं थीं उनमें से एक जिसका नाम सुनीता था, की माँ को 'एबीप्लस' खून की सख्त जरूरत है। सचमुच अगर इस ग्रुप का खून उन्हें कुछ मिनटों में नहीं मिल पाया तो उसकी जान चली जाएगी। शहर बहुत बड़ा नहीं था। उस शहर में ब्लड बैंक भी नहीं था जहां से कोई व्यक्ति अपने रोगी के लिए मैंचिंग वाला ब्लड खरीद कर ला सकता था।
    रवि दौड़ा-दौड़ा उस नर्सिंग होम के कमरा न. 13 के नजदीक जा पहुंचा। कमरे से धीरे से दस्तक दी तो वही युवती दरवाजा खोल बाहर निकली। रवि की खुशी का ठिकाना ना था। पर उस युवती ने उसे देख आग बबूला हो उसे अपनी औकात में रहने की धमकी तक दे डाली। रवि निश्छल हो उसकी धमकियां को असरहीन हो सुनता रहा और बीच में ही उसे टोककर बोल पड़ा-दीदी ! अभी वक्त बहस या गुस्सा करने का नहीं हैं। अभी वक्त है माँ को खून चढ़ाने का। मेरा ब्लडग्रुप 'एबीप्लस' है। आप मेरे रिक्शे पर गुस्से में ही सही पर माँ की जरूरत वाला खून का ग्रुप बोल गई थीं और यह भी बोल गई थी कि वह ब्लडग्रुप आसानी से नहीं मिलते। मैं उसी वक्त से अपना मन बना लिया था कि मैं भले ही रिक्शावाला सही, मजबूर सही, पर आज खून के चलते माँ को जिंदगी से दूर नहीं होने दूंगा और मैं ढूंढ़ता-ढूंढ़ता आपके सामने खड़ा हूँ।
    तू खून देगा। एक रिक्शावाला। तुम्हारी हिम्मत कि तुम मेरी मजबूरी को भुनाकर मुझे एक रिक्शेवाला का एहसानमंद बनाना चाहता है। चला जा। अभी चला जा वरना मुझे इतनी समझ है कि ऐसे लोगों के साथ क्या किया जाता है ?
    बहनजी यह आप नहीं आपका गुरूर बोलता है। वरना इन मौंकों पर कोई भला किसी को कहां तौलता है। बहनजी, मेरे तन से जब तक खून निकलकर माँ के खून में नहीं जा मिलता है तबतक जो चाहो बोल लो वरना इसी रिक्शेवाने का वह खून जब माँ के खून में जा मिले तो आप क्या डाक्टर भी यह बोल पाने में सक्षम न हो कि कौन सा खून रिक्शेवाले का है और कौन सा माँ का।
    दोनों के बीच बहस जारी ही थी कि नर्सिंग होम की सिस्टर ने रवि...रवि कह कर बुलाना शुरू किया। रवि दौड़ा-दौड़ा उसके पास गया। आपरेशन थियेटर में रवि के ब्लड ग्रुप का तेजी से मिलान कर लेने के बाद उधर सुनीता की माँ को रवि का खून चढ़ाया जा रहा था। कुछ क्षण बाद सुनीता की माँ आराम महसूस कर रही थी। उसे गहरी नींद आने लगी थी। इधर सुनीता माँ के चेहरे पर लौटती आ रही नयी जिंदगी जैसी खुशी से सराबोर हो फूले नहीं समा रही थी। मन ही मन उस रिक्शेवाले के प्रति उपजी दुर्भावना को लेकर प्रायश्चित करने का ठान रही थी और अपने गाल को कुछ देर तक माँ के ंिसर पर रख नये पुराने ख्यालों में खो गई।
    कुछ पल बाद सुनीता अपने में हीन भाव लिए रवि को अपनी गलती का अहसास जताने के लिए ज्योंही उस ओर मुड़ी तो उसने रवि को नहीं पाया। वह वेचैन हो उठी। उसे उसका पता मालूम ना था। वह कम से कम उसे थैंक्स देना चाहती थी। वह रो रोकर, अपनी गलतियों के कारण उपजे दाग को धो देना चाहती थी। पर उस शहर में उस अजनबी अनजान रिक्शावाले को खोजना उतना भी आसान ना था।
    रवि खून देने के बाद उस माँ को मृत्यु के मुँह से छीनने की खुशी में अंदर ही अंदर र्स्व्गिक आनंद महसूस करते हुए बिना सुनीता से उसके बारे में कुछ आगे पूछे तेजी से नर्सिंग होम छोड़ चुका था। उसे अपनी औकात पता थी। उसे शहर से बाहर अपने गाँव जाकर लोगों के यहां टयूशन जो पढ़ाना था। वह भी तब तो और भी जरूरी हो गया था जबकि प्राय सभी स्कूल में परीक्षां का समय था।

गणतांत्रिक शिक्षा

                                     चंद्रेश कुमार छतलानी का आलेख - गणतांत्रिक शिक्षा

आज 26 जनवरी 2015, जब दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र का राष्ट्रपति बराक ओबामा हमारी ख़ुशी में शामिल होने आयें है, तो एक यह सोच अवश्यम्भावी होनी ही चाहिये कि हमारे अपने देश में इस ख़ुशी में कौन-कौन और क्या-क्या शरीक है| आज ही का दिन है जब यह विचार करने की आवश्यकता है कि कौन हैं जो देश की गणतांत्रिक व्यवस्था का अभिन्न अंग हैं और क्या ऐसी व्यवस्थाएं हैं, प्रक्रियाएं हैं, सेवाएँ हैं, जिम्मेदारी हैं और अधिकार हैं जो गणतांत्रिक हैं? और जो कुछ गणतांत्रिक नहीं है वो यदि भारत का अंग है तो जीवित कैसे हैं? हमारे देश की आधी आबादी पढ़ना-लिखना भी नहीं जानती हो, जिसे जीने का हक भी मुश्किल से हासिल हो रहा हो क्‍या लोकतंत्र में उसकी भागीदारी का कोई अर्थ है ?
हम कहते हैं कि देश की जनता राज करती है सारे देश में गणतंत्र है तो फिर ये “रूलिंग पार्टी” क्या बला है? कहीं ऐसा तो नहीं कि पिछले कई वर्षों से भारतीय लोकतंत्र के नाम पर एक शासन व्‍यवस्‍था राज कर रही है? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे देश में लोकतंत्र का अर्थ केवल वोट देने के कर्तव्य और वोट देने के ही अधिकार से लगाया जाता है, उसके पश्चात एक शासन प्रणाली आ जाती है?
कितने प्रश्न हैं, जिन्हें सुलझाना आवश्यक है, प्रश्न यह भी है कि सुलझाये कौन? इतना शिक्षित कौन है, देश के वो लोग जो केवल मंहगाई का रोना रोते रहते हैं या फिर वो लोग जो किसी न किसी तरह से भ्रष्टाचार कर देश का नुकसान कर रहे हैं? जो बचे हुए हैं वो मौन हैं|
तो मेरे अनुसार, सबसे पहले जो आवश्यकता महसूस की जानी चाहिए वो है गणतंत्र की शिक्षा की, हालाँकि यह दुःख का विषय है लेकिन इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी गणतंत्र की शिक्षा और शिक्षा में गणतंत्र दोनों की बेहद आवश्यकता है| शिक्षा में शासन पद्धति अपनी मनमानी करती आ रही है, उचित शिक्षा का अर्थ केवल डिग्री से लगाया जा रहा है या फिर छोटा-मोटा शोध करने से, लेकिन जन-जन की शिक्षा जो जनतांत्रिक हो, उस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है| शिक्षा में जब निर्णय लेने का अधिकार जनता को अर्थात सभी हितधारकों (stakeholders) को मिल जायेगा तभी शिक्षा में गणतन्त्र सफल है|
और रही बात गणतंत्र की शिक्षा की, पिछले कई वर्ष तो भारतीय गणतंत्र के नाम पर एक शासन व्‍यवस्‍था के रहे हैं, शासन जो लोकतंत्र के नाम पर राज करता है। हमारे देश में लोकतंत्र का अर्थ केवल वोट देने के कर्तव्य और वोट देने के ही अधिकार से लगाया जाता है| उसके पश्चात एक शासन प्रणाली आ जाती है|
एक ख़ुशी का विषय यह है कि मौजूदा प्रधानमंत्री जन जन को देश की विभिन्न गतिविधियों से जोड़ने का प्रयत्न कर रहे हैं| E-Governance का नाम उन्होंने Democratic Governance दिया है और इस दिशा में कई महत्वपूर्ण पहल कर दी हैं| My Government परियोजना से जुड़ कर भारत का प्रत्येक नागरिक अपनी राय दे सकता है| लेकिन यह केवल एक कदम है, अभी मीलों का सफ़र बाकी है|
हमारे समाज के आर्थिक, राजनीतिक व सामाजिक रूपांतरण के लिए एक शांतिपूर्ण क्रांति लाने की क्षमता केवल शिक्षा में ही है। हमें सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षा केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों तक सीमित न रह जाए। इसमे सड़ी गली रूढि़यों और सामाजिक विषमता को उखाड़ फेंकने की ताकत भी होनी चाहिए।
1986 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय (अमेरिका) में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि ‘‘मैं नहीं समझता कि साक्षरता लोकतंत्र की कुंजी है, हमने देखा है, और मैं सिर्फ भारत की ही बात नहीं कर रहा हूं, कि कभी-कभी साक्षरता दृष्टि को संकुचित बना देती है, उसे विस्तृत नहीं बनाती।’’ यह हमारे देश की शिक्षा का हाल किसी न किसी तरह बयाँ कर ही रहा है, उचित शिक्षा की आवश्यकता तब भी राजीव गांधी ने अनुभव की थी और आज नरेंद्र मोदी भी कर रहे हैं|
सच तो यही है कि शिक्षा गणतांत्रिक हो और शिक्षा गणतंत्र को मज़बूत करे तभी वो सार्थक शिक्षा है| सार्थक शिक्षा के सभी पहलुओं पर ध्यान देने के महती आवश्यकता है और इसका एक महत्वपूर्ण पहलू है गणतंत्र की शिक्षा जो केवल सैद्धांतिक ही नहीं हो वरन व्यवहारिक भी हो| उसके पश्चात यह कहते हुए सच्ची ख़ुशी का अनुभव होगा – “मेरा गणतंत्र महान”|
- चंद्रेश कुमार छतलानी


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